मिर्ज़ा दाग़ ( जन्म : २५ मई, १८३१) के चुने हुए शेर
न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना
कि अपना घर है अपना, और है अपना वतन अपना
जो भले हैं,वो बुरों को भी भला कहते हैं
न बुरा सुनते हैं अच्छे, न बुरा कहते है
वो नक़दे-दिल को हमेंशा नज़र में रखते हैं
जो आंख वाले हैं,अच्छा-बुरा परखते हैं
बादशाहों को भी लोग हैं देने वाले
यह फ़क़ीरों ही को अल्लाह ने हिम्मत दी है
ढ़ूंढ़ती है तुझे मेरी आंखें
ए वफ़ा कुछ तेरा पता भी है
न आया है, न आए उनके वादे का यक़ीं बरसों
यूं ही आज-कल-परसों, मगर मिलते नहीं बरसों
यहाँ सुनिये दाग़ की लिखी ग़ज़ल -" न- रवा कहिये"
बैतुल-हज़न=निवास स्थान, नक़दे-दिल= हृदय -पूँजी, रवा =बेढंगा
_______पसंदीदा उर्दू शायरी का एक गुलदान________ * ज़ेबे गुल ख़ुशबू से है, ख़ुशबू न हो तो कुछ भी नहीं *
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शुक्रवार, मई 25, 2007
बुधवार, मई 16, 2007
मजाज़ की लिखी एक और ग़ज़ल :
कुछ तुझको खबर है हम क्या क्या, ये शोरिशे-दौरां भूल गए
वो ज़ुल्फ़े-परीशां भूल गये, वो दीदा-ए-गिरियां भूल गए
ऐ शौक़े-नज़ारा क्या कहिये, नज़रों मे कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़े-तसव्वुर क्या कीजै, हम सूरते-जानां भूल गए
अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं,अब दिल की कली खिलती ही नहीं
ऐ फ़स्ले-बहारां रुख़्सत हो,हम लुत्फ़े-बहारां भूल गए
सब का तो मुदावा कर डाला,अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबां सी डाले,अपना ही गरेबां भूल गए
ये अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिये
इक नश्तरे-ज़हर-आगीं रखकर, नज़दीके-रगे-जां भूल गए
वो ज़ुल्फ़े-परीशां भूल गये, वो दीदा-ए-गिरियां भूल गए
ऐ शौक़े-नज़ारा क्या कहिये, नज़रों मे कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़े-तसव्वुर क्या कीजै, हम सूरते-जानां भूल गए
अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं,अब दिल की कली खिलती ही नहीं
ऐ फ़स्ले-बहारां रुख़्सत हो,हम लुत्फ़े-बहारां भूल गए
सब का तो मुदावा कर डाला,अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबां सी डाले,अपना ही गरेबां भूल गए
ये अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिये
इक नश्तरे-ज़हर-आगीं रखकर, नज़दीके-रगे-जां भूल गए
शोरिशे-दौरां=संसार के उपद्रव, ज़ुल्फ़े परीशां=बिखरे केश, दीदा-ए-गिरियां=रोती आँखें, शौक़े-नज़ारा= देखनें की चाह,ज़ौके-तसव्वुर= कल्पना की प्रवृति, सूरते-जानां=प्रेयसी की शक्ल, फ़स्ले-बहारां=वसन्त ऋतु,मुदावा=उपचार, नश्तरे-ज़हर= विष में बुझा हुआ नश्तर
गुरुवार, मई 10, 2007
असरारुल हक़ "मजाज़" का जन्म १९०९ में अवध के एक प्रसिद्ध कस्बे रदौली में हुआ था । मजाज़ की शायरी का आरम्भ बिलकुल परम्परागत ढंग से हुआ और उन्होनें उर्दू शायारी के मिज़ाज का सदैव ख़्याल रखा। श्री प्रकाश पंडित मजाज़ की शायरी में देखते है "सुलझा हुआ बोध या विवेक" और लिखते हैं "खा़लिस इश्क़िया शायरी करते हुए भी वह अपनें जीवन तथा जन साधारण के जीवन के प्रभावों तथा प्रकृतियों को विस्मृत नहीं करता । हुस्नों-इश्क़ का एक अलग संसार बसाने की बजाय वह हुस्नों-इश्क़ पर लगे सामाजिक प्रतिबन्धों के प्रति अपना रोष प्रगट करता है।आसमानी हूरों की ओर देखनें की बजाय उसकी नज़र रास्ते के गंदे लेकिन ह्र्दयाकर्षक सौन्दर्य पर पड़ती है और इन दृश्यों के प्रेक्षण के बाद वह जन-साधारण की तरह जीवन के दु:ख-दर्द के बारे में सोचता है और फिर कलात्मक निखार के साथ जो शे’र कहता है तो उसमें केवल किसी’ज़ोहरा-जबीं’ से प्रेम ही नहीं होता,विद्रोह की झलक भी होती है। यह विद्रोह कभी वह वर्तमान जीवन-व्यव्स्था से करता है, कभी साम्राज्य से;और जीवन की वंचनाओं के वशीभूत कभी कभी इतना कटु हो जाता है कि अपनी ज़ोहरा-जबीनों के रंगमहलों को छिन्न-भिन्न कर देना चाहता है।"
नहीं ये फ़िक्र कोई रहबरे-कामिल नहीं मिलता
कोई दुनिया में मानूसे-मिज़ाजे-दिल नहीं मिलता
कभी साहिल पे रहकर शौक़ तूफ़ानों से टकराएं
कभी तूफ़ां में रहकर फ़िक्र है साहिल नहीं मिलता
ये आना कोइ आना है कि बस रस्मन चले आये
ये मिलना खा़क मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता
शिकस्ता-पा को मुज़्दा, ख़स्तगाने-राह को मुज़्दा
कि रहबर को सुराग़े-जादा-ए-मंज़िल नहीं मिलता
वहां कितनों को तख़्तो ताज का अरमां है क्या कहिये
जहां साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
ये क़त्ले-आम और बे-इज़्न क़त्ले-आम क्या कहिये
ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें का़तिल नहीं मिलता
रहबरे-कामिल= सिद्ध पथ-प्रदर्शक, मानूसे-मिज़ाजे-दिल= स्वभाव से परिचित( मित्र), शिकस्ता-पा= शिथिल जनों को, मुज़्दा=मंगल समाचार, ख़स्त्गाने-राह= मंज़िल के मार्ग का पता ,साइल=भिखारी, कासा-ए-साइल=भिक्षा-पात्र,
बे-इज़्न क़त्ले -आम= निर्देश बिना सर्व-संहार, बिस्मिल= आहत
नहीं ये फ़िक्र कोई रहबरे-कामिल नहीं मिलता
कोई दुनिया में मानूसे-मिज़ाजे-दिल नहीं मिलता
कभी साहिल पे रहकर शौक़ तूफ़ानों से टकराएं
कभी तूफ़ां में रहकर फ़िक्र है साहिल नहीं मिलता
ये आना कोइ आना है कि बस रस्मन चले आये
ये मिलना खा़क मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता
शिकस्ता-पा को मुज़्दा, ख़स्तगाने-राह को मुज़्दा
कि रहबर को सुराग़े-जादा-ए-मंज़िल नहीं मिलता
वहां कितनों को तख़्तो ताज का अरमां है क्या कहिये
जहां साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
ये क़त्ले-आम और बे-इज़्न क़त्ले-आम क्या कहिये
ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें का़तिल नहीं मिलता
रहबरे-कामिल= सिद्ध पथ-प्रदर्शक, मानूसे-मिज़ाजे-दिल= स्वभाव से परिचित( मित्र), शिकस्ता-पा= शिथिल जनों को, मुज़्दा=मंगल समाचार, ख़स्त्गाने-राह= मंज़िल के मार्ग का पता ,साइल=भिखारी, कासा-ए-साइल=भिक्षा-पात्र,
बे-इज़्न क़त्ले -आम= निर्देश बिना सर्व-संहार, बिस्मिल= आहत
शुक्रवार, मई 26, 2006
नवाब मिर्ज़ा खाँ 'दाग़' का जन्म २५ मई ,१८३१ को दिल्ली के चाँदनीं चौक में नवाब शमसुद्दीन ( नवाब लोहारा के भाई) के घर हुआ था। दाग़ जब ६ बरस के थे तो पिता को खो बैठे । उसके बाद दाग़, माँ के बहादुरशाह बादशाह के युवराज साथ पुनर्विवाह के बाद शाही किले में रहनें आ गये जहाँ, शाही ढंग से उनकी शिक्षा हुई। ११ साल की उम्र से ही दाग़ कविता करनें लगे थे । मौलाना हामिदहुसैन कादरी के अनुसार : ' ग़ज़ल की ख़ूबी के लिये ज़रूरी है कि अलफ़ाज़ फ़सीह ( सुन्दर एवं भावयुक्त) हो, बन्दिश चुस्त व सही हो। मुहावरात का इस्तेमाल मौज़ूँ व बरमहल हो। तर्ज़ेअदा में जिद्दत हो। दाग़ के यहाँ ये सब चीज़ें बेहतर से बेहतर हैं और उनपर शोख़बयानी और ज़राफ़त तराज़ी का इज़ाफ़ा है। दाग़ का सबसे चमकता रंग शोख़बयानी है ।'
दिल में रहता है जो, आँखों से निहां रहता है
पूछते-फिरते हैं वो, ' दाग़ ' कहाँ रहता है
कौन सा चाहने वाला है तुम्हारा ममनून
सर तो रहता नहीं, एहसान कहाँ रहता है
वह कड़ी बात से लेते हैं जो चुटकी दिल में
पहरों उनके लबे-नाज़ुक पे निशां रहता है
मैं बुरा हूँ तो बुरा जान के मिलिये मुझसे
ऐब को ऐब समझिए तो कहां रहता है
ख़ाना-ए-दिल में तकल्लुफ़ भी रहे थोड़ा-सा
कि तेरा दाग़ , तेरा दर्द यहां रहता है
लामकां तक की ख़्रबर हज़रते-वाइज़ ने कही
यह तो फ़रमाएं कि अल्लाह कहां रहता है
अपने कूचे में नई राह निकाल अपनें लिए
कि यहां मजमा-ए-आफ़तज़दगां रहता है
ज़ख़्म आएं तो सभी ख़ुश्क हुआ करते हैं
'दाग़' मिटता ही नहीं, इसका निशां रहता है
निहां= छिपा हुआ , ममनून= एहसानमंद, तकल्लुफ़= औपचारिकता, लामकां = बेघर, हज़रते-वाइज़= उपदेशक, मजमा-ए-आफ़तज़दगां = आफ़त का मारा हुआ
सोमवार, फ़रवरी 13, 2006
आधुनिक उर्दू साहित्य में विशेष स्थान रखने वाले शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म १३ फ़रवरी १९११ को सियालकोट में हुआ था । फ़ैज़ नें अपने कविता संग्रह नक़्शे-फ़रियादी की भूमिका में लिखा था '" शे'र लिखना जुर्म न सही लेकिन बेवजह शे'र लिखते रहना ऐसी अक़्लमंदी भी नही है ।"
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मता-ए-लौहो-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है
कि ख़ूने-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैने
ज़बां पे मुहर लगी है तो क्या, कि रख दी है
हर एक हल्क़-ए-ज़ंजीर में ज़बां मैने
मता-ए-लौहो-क़लम = क़लम और तख्ती की पूंजी, ख़ूने-दिल =ह्र्दय रक्त,हल्क़-ए-ज़ंजीर = ज़ंजीर की हर एक कड़ी
रविवार, नवंबर 27, 2005
" मेरी शायरी का फ़न( कला) ,मारुसी ( पैतृक) नहीं है क्योंकि न मेरे वालिद शायर थे न दादा। हाँ, मेरी सातवीं पुश्त में जो मेरे जद्दे-अमजद ( पूर्वज) थे उनके बारे में किताबों में पढ़ा है कि वो शायर थे और उनका नाम ख़लीफ़ा मोहम्मद वासिल था। मुमकिन हैं वही ज़ौक़( अभिरुचि) सात पुश्तों की छलांग लगाकर मेरे हिस्से में आया हो"-
>>>>शकील बदायुनी<<<<
मेरी ज़िन्दगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िन्दगी का अलम नहीं
जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ां बहार से कम नहीं
मेरा कुफ़्र हासिले-ज़ुहद है, मेरा ज़ुहद हासिले-कुफ़्र है
मेरी बन्दगी वो है बन्दगी जो रहीने-दैरो-हरम नहीं
मुझे रास आयें खुदा करे यही इश्तिबाह की साअ़तें
उन्हें एतबारे-वफ़ा तो है मुझे एतबारे-सितम नहीं
वही कारवां, वही रास्ते, वही ज़िन्दगी, वही मरहले
मगर अपने-अपने मुक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं
न वो शाने-जब्रे-शबाब है, न वो रंगे-क़हरे-इताब है
दिले-बेक़रार पे इन दिनों है सितम यही कि सितम नहीं
न फ़ना मेरी न बक़ा मेरी, मुझे ऐ 'शकील' न ढूंडिये
मैं किसी का हुस्ने-ख़्याल हूं मेरा कुछ वुजूदो-अलम नहीं
अलम=ग़म, कुफ़्र = नास्तिकता, हासिले-ज़ुहूद= संयम का फल,रहीने-दैरो-हरम= मन्दिर-मस्जिद की आभारी,इश्तिबाह की साअ़तें= शंका के पल, शाने- जब्रे-शबाब= यौवन के दमन की शान,रंगे-कहरे-इताब=रोष के प्रकोप का रंग,फ़ना=मृत्यु,बक़ा=जीवन, वुजूदो-अदम= अनिस्तत्व और अस्तित्व
गुरुवार, नवंबर 17, 2005
तरक़्क़ीपसंद शायर कैफ़ी आज़मी की लेखनी ,आम आदमी की समस्याओं के लिये करुणामयी होती है तो जूझने के लिये आशा और विश्वास भी प्रदान करती है । शायर का अवलोकन और अन्वेषण अनूठा है और मानों हमें, अपने आप से जोड़ जाता है ।
वो भी सराहने लगे अरबाबे-फ़न के बाद
दादे-सुख़न मिली मुझे तर्के-वतन के बाद
दीवानावार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तेरी अंजुमन के बाद
एलाने-हक़ में ख़तरा-ए-दारो' रसन तो है
लेकिन सवाल ये है कि दारो-रसन के बाद
होंटों को सी के देखिये पछताइएगा आप
हंगामें जाग जाते हैं अक्सर घुटन के बाद
ग़ुरबत की ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप
क़द्रे-वतन हुई हमें तर्के-वतन के बाद
इंसाँ की ख़ाहिशों की कोई इन्तेहा नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद
अरबाब= मित्रों, दादे-सुख़न= कविता की प्रशंसा, तर्के-वतन=वतन छोड़ना, खतरा-ए-दारो'रसन=फ़ाँसी पाने का ख़तरा,ग़ुरबत= परदेस
वो भी सराहने लगे अरबाबे-फ़न के बाद
दादे-सुख़न मिली मुझे तर्के-वतन के बाद
दीवानावार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तेरी अंजुमन के बाद
एलाने-हक़ में ख़तरा-ए-दारो' रसन तो है
लेकिन सवाल ये है कि दारो-रसन के बाद
होंटों को सी के देखिये पछताइएगा आप
हंगामें जाग जाते हैं अक्सर घुटन के बाद
ग़ुरबत की ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप
क़द्रे-वतन हुई हमें तर्के-वतन के बाद
इंसाँ की ख़ाहिशों की कोई इन्तेहा नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद
अरबाब= मित्रों, दादे-सुख़न= कविता की प्रशंसा, तर्के-वतन=वतन छोड़ना, खतरा-ए-दारो'रसन=फ़ाँसी पाने का ख़तरा,ग़ुरबत= परदेस
मंगलवार, अक्टूबर 25, 2005
जनाब क़तील शिफ़ाई का जन्म २४ दिसंबर १९१९ , हरिपुर ,हज़ारा( सरहद) का बताया जाता है उनकी शायरी में, माधुर्य तथा शब्द सौन्दर्य होने के साथ साथ शायर का मनोवृतान्त भी है, जो कविता को सही मायने में सशक्त बनाता है ।
आज और कल
जब छलकते हैं ज़रो-सीम के गाते हुए जाम
एक ज़हराब सा माहौल में घुल जाता है
काँप उठता है तिही-दस्त जवानो का ग़रूर
हुस्न जब रेशमो-कमख़्वाब में तुल जाता है
मैंने देखा है कि इफ़्लास के सहराओं मे
क़ाफ़िले अ़ज़्मते-एहसास के रुक जाते हैं
बेकसी गर्म निगाहों को झुलस देती है
दिल किसी शो'ला-ए-ज़रताब से फुक जाते हैं
जिन उसूलों से इबारत है मुहब्बत की असास
उन उसूलों को यहाँ तोड़ दिया जाता है
अपनी सहमी हुई मंज़िल के तहफ़्फ़ुज़ के लिये
रहगुज़ारों में धुआँ छोड़ दिया जाता है
मैंने जो राज़ ज़माने से छुपाना चाहा
तूने आफ़ाक़ पे उस राज़ का दर खोल दिया
मेरी बाँहों ने जो देखे थे सुनहरे सपने
तूने सोने की तराजू मे उन्हें तोल दिया
आज इफ़्लास ने खाई है ज़रो-सीम से मात
इसमें लेकिन तेरे जल्वों का कोई दोष नहीं
ये तग़य्युर इसी माहौल का पर्वुर्दा है
अपनी बेरंग तबाही का जिसे होश नहीं
रह्गुज़ारों के धुँधलके तो ज़रा हट जाएँ
अपनें तलवों से ये काँटे भी निकल जाएँगे
आज और कल की मुसाफ़त को ज़रा तै कर लें
वक़्त के साथ इरादे भी बदल जाएँगे
ज़रो-सीम= सोने चाँदी , ज़हराब= तरल विष , तिही-दस्त=ख़ाली हाथ
इफ़्लास= निर्धनता, अज़्मते-एहसास=भावों की महानता , ज़रताब= धन,असास=नींव,
तहफ़्फ़ुज= रक्षा, आफ़ाक़= संसार ,तग़य्युर=परिवर्तन, पर्वुर्दा = वातावरण, मुसाफ़त= अन्तर
आज और कल
जब छलकते हैं ज़रो-सीम के गाते हुए जाम
एक ज़हराब सा माहौल में घुल जाता है
काँप उठता है तिही-दस्त जवानो का ग़रूर
हुस्न जब रेशमो-कमख़्वाब में तुल जाता है
मैंने देखा है कि इफ़्लास के सहराओं मे
क़ाफ़िले अ़ज़्मते-एहसास के रुक जाते हैं
बेकसी गर्म निगाहों को झुलस देती है
दिल किसी शो'ला-ए-ज़रताब से फुक जाते हैं
जिन उसूलों से इबारत है मुहब्बत की असास
उन उसूलों को यहाँ तोड़ दिया जाता है
अपनी सहमी हुई मंज़िल के तहफ़्फ़ुज़ के लिये
रहगुज़ारों में धुआँ छोड़ दिया जाता है
मैंने जो राज़ ज़माने से छुपाना चाहा
तूने आफ़ाक़ पे उस राज़ का दर खोल दिया
मेरी बाँहों ने जो देखे थे सुनहरे सपने
तूने सोने की तराजू मे उन्हें तोल दिया
आज इफ़्लास ने खाई है ज़रो-सीम से मात
इसमें लेकिन तेरे जल्वों का कोई दोष नहीं
ये तग़य्युर इसी माहौल का पर्वुर्दा है
अपनी बेरंग तबाही का जिसे होश नहीं
रह्गुज़ारों के धुँधलके तो ज़रा हट जाएँ
अपनें तलवों से ये काँटे भी निकल जाएँगे
आज और कल की मुसाफ़त को ज़रा तै कर लें
वक़्त के साथ इरादे भी बदल जाएँगे
ज़रो-सीम= सोने चाँदी , ज़हराब= तरल विष , तिही-दस्त=ख़ाली हाथ
इफ़्लास= निर्धनता, अज़्मते-एहसास=भावों की महानता , ज़रताब= धन,असास=नींव,
तहफ़्फ़ुज= रक्षा, आफ़ाक़= संसार ,तग़य्युर=परिवर्तन, पर्वुर्दा = वातावरण, मुसाफ़त= अन्तर
गुरुवार, अक्टूबर 20, 2005
बुधवार, अक्टूबर 12, 2005
जनाब ख़्वाजा हैदर अली आतिश की पैदाइश १७७८ में उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद शहर की बताई जाती है।आतिश अमीरों के लिये क़सीदे कहने से दूर रहे । इन्हे शायरी और तलवारबाज़ी का शौक़ था एवं मशहूर शायर 'मीर' को आतिश ने अपना उस्ताद माना।
गुल के अफ़ज़ मेरी आँखों में हैं दिलजू कांटे
फूल रखता है तेरी बू तो तेरी ख़ू कांटे
हमनशीं दिल नहीं इक आबला-सा पकता है
जी में आता है भरूं चीर के पहलू कांटे
बद-सरिश्तों को न नेकों का असर हो हरगिज़
सुहबते गुल से न होवें कभी ख़ुशबू कांटे
बाग़े-आलम में जो राहत है तो फिर रंज भी है
ता-कमर गुल है तो यां ता-सरे-ज़ानूं कांटे
जो न दे रंग किसी को उसे होता नहीं रंज
पांव पर मेरे नहीं पाने के क़ाबू कांटे
बद-सरिश्त=बुरे स्वभाव वाले
बुधवार, अक्टूबर 05, 2005
अली सरदार जाफ़री का जन्म २९ नवम्बर १९१३ को बलरामपुर,ज़िला गोंडा ( अवध) में हुआ था । सरदार जाफ़री की शायरी में आशावाद एवं इंक़लाबियत का चित्रण नयी उमंगें जगाता है ।शायर का सौंदर्यबोध हमें और आप को ख़ुद ब ख़ुद रोमानी बनता चलता है। एक उदाहरण इस प्रकार है :
इश्क़ का नग़्मा जुनू के साज़ पर गाते हैं हम ।
अपने ग़म की आंच से पत्थर को पिघलाते है हम ॥
जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं।
वक़्त पड़ जाये तो अंगारों पे सो जाते है हम॥
द्फ़्न होकर ख़ाक में भी द्फ़्न रह सकते नहीं ।
लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम।....
इश्क़ का नग़्मा जुनू के साज़ पर गाते हैं हम ।
अपने ग़म की आंच से पत्थर को पिघलाते है हम ॥
जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं।
वक़्त पड़ जाये तो अंगारों पे सो जाते है हम॥
द्फ़्न होकर ख़ाक में भी द्फ़्न रह सकते नहीं ।
लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम।....
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