इक़बाल के अलफ़ाज़ :
ज़ुलमे-बहर में खोकर संभल जा।
तड़प जा, पेंच खा-खाकर बदल जा ॥
नहीं साहिल तेरी क़िस्मत में ऐ मौज ।
उभरकर जिस तरह चाहे निकल जा॥
ज़ुलमे-बहर= समुद्र की गहराईयों में, मौज =लहर
*पसंदीदा उर्दू शायरी का एक गुलदान*
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें